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ब्रिक्स एनएसए बैठक की मेजबानी करेगा भारत: चीनी विदेश मंत्री वांग यी और रूसी सुरक्षा प्रमुख सर्गेई शोइगु आएंगे नई दिल्ली, द्विपक्षीय और वैश्विक सुरक्षा समीकरणों पर होगी महाचर्चा

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Posted On:Friday, June 19, 2026

नई दिल्ली: वैश्विक कूटनीति के केंद्र में भारत एक बार फिर अपनी मजबूत स्थिति दर्ज कराने जा रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल के विशेष निमंत्रण पर चीन के विदेश मंत्री और शीर्ष राजनयिक वांग यी आगामी 22-23 जून 2026 को भारत की आधिकारिक यात्रा पर आ रहे हैं। वांग यी नई दिल्ली की मेजबानी में आयोजित होने वाली ब्रिक्स (BRICS) देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों और उच्च प्रतिनिधियों की 16वीं उच्चस्तरीय बैठक में हिस्सा लेंगे। भारत वर्ष 2026 में "नवाचार, सहयोग और सतत विकास का निर्माण" (Building Innovation, Cooperation, and Sustainable Development) के मुख्य विषय के साथ ब्रिक्स समूह की अध्यक्षता कर रहा है। इस महत्वपूर्ण सुरक्षा विलेख संवाद में रूस की सुरक्षा परिषद के सचिव सर्गेई शोइगु के भी शामिल होने की प्रबल संभावना है, जो इसे रणनीतिक रूप से बेहद वजनदार बनाता है।

यह उच्चस्तरीय बैठक एक ऐसे समय में आयोजित हो रही है जब अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति में बड़े कूटनीतिक विखंडन बदलाव देखे जा रहे हैं। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी नेतृत्व के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और परमाणु वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए 60 दिनों के युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं। ऐसे वैश्विक माहौल में ब्रिक्स के सदस्य देश, जिनमें अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया जैसे नए शक्तिशाली विलेख देश भी शामिल हो चुके हैं, वैश्विक और क्षेत्रीय स्थिरता पर गहन विमर्श करेंगे।

राजनयिक विश्लेषकों का मानना है कि वांग यी की यह यात्रा भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों में आ रहे क्रमिक और सकारात्मक सुधार के लिहाज से अत्यंत कूटनीतिक महत्व रखती है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच वर्ष 2025 में तियानजिन एससीओ शिखर सम्मेलन और 2024 के कजान सम्मेलन में हुई सीधी वार्ताओं ने दोनों देशों के बीच जमीनी तनाव को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों पक्ष सीमावर्ती क्षेत्रों में पूर्ण शांति बनाए रखने और अपने मतभेदों को विखंडन विवादों में तब्दील न होने देने की विधिक प्रतिबद्धता पर आगे बढ़ रहे हैं, जो पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता के लिए एक शुभ संकेत है।


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